छत्तीसगढ़ः
खनिज आधारिर्त
आिथर््ाक विकास
में क्षेत्रिय
विषमता
र्पूिणर््ामा
शुक्ला1] प्रदीप
शुक्ला2
1विभागाध्यक्ष
भूगोल विभाण् दुर्गा
महाविद्यालय, रायपुर
2छत्तीसगढ प्रशासन
अकादमी, निमोरा, रायपुर
छत्तीसगढ़ प्रदेश
को राष्ट्र के
खनिज मानचित्र
में एक विशिष्ट
स्थान प्राप्त
है। प्रदेश औद्योगिक
विकास की दृष्टिकोण
से पिछड़ा हुआ है।प्रदेश
में खनिज संसाधन
की बाहुल्यता के
साथ क्षेत्र के
आथर््िाक विकास
में अनेक ंक्षेत्रिय
विषमताए है।क्षेत्रिय
विषमता का अध्ययन
करना भूगोल का
विषय है।खनिजों
के क्षेत्रिय उपयोग
के आधार पर प्रदेश
मे जिलेवार असमानतायें
हैं। अतः असमानताए
को ध्यान में रखकर
क्षेत्र का समग्र
विकास करना हैं।
अध्ययन क्षेत्र:
खनिजो का संग्रहालय
छत्तीसगढ ़राज्य
मघ्य प्रदेश से
पृृथक हो कर 1 नवम्बर
2000 को भारतीय
संघ का 26वां राज्य
बना । खनिजों का
संग्रहालय कहलाने
वाला राज्य 135133 वर्ग किमी.
भौगोलिक क्षेत्रफल
में फैला हुआ है।
इसका विस्तार 170 46- 240 6‘
उत्तरी
अक्षांश एवं 800 15- 840 25
पूर्वी
देशांन्तर के मध्य
उत्तर से दक्षिण
- 650 किमी.
तथा पूर्व से पश्चिम
में 385 किमी
़है। यहां 20833803 व्यक्ति
प्रदेश के 27 जिलो में
निवास करतें है।
विघि तंत्र:
प्रस्तुत शोध पत्र
खनिज आधरित आर्थिक
विकास में क्षेत्रीय
विषमता के अध्ययन
के लिये द्वितीयक
आंकड़ो प्रयोग किया
गया हैं। यह प्रदेश
के भौमिकीय खनिकर्म
संचालनालय रायपुर, औद्योगिक
केंद्र रायपुर, साख्यिकीय
संचालनालय रायपुर,आदि से
संकलित किया गया
है।प्रदेश में
आर्थिक विषमता
को ज्ञात करने
हेतु आठ सूचक -खनिज
उत्पादन,खनिज राजस्व,खानो की
संख्या, सड़को की लंम्बाई,पूंजी
निवेश,उद्योगो की
संख्या,श्रमिकों की
संख्या,एवं उर्जा
खपत आदि आधार माना
है।उपरोक्त आठ
सूचक के आधार पर
आर्थिक विकास के
विषमता को ज्ञात
करने हेतु कारक
विश्लेषण विधि
;थ्ंबजवत
।दंसलेपेद्ध का
उपयोग कर विश्लेषण
किया गया है।कारक
विश्लेषण से कारकों
की खोज कर प्रमुख
चरों की सहभागिता
स्तर को स्पष्ट
किया गया है। इन
समंको के आधार
पर मानचित्रण के
माध्यम से क्षेत्रीय
विषमता को प्रदर्शित
किया गया है।
राष्ट्रीय
एवं क्षे़त्रीय
स्तर पर औद्यौगिकभू-दृष्य
में तीव्र गति
से परिवर्तन हो
रहा है।प्रदेश
खनिज संसाधन की
दृष्टिकोण से संपन्न
है। यहाॅ के संपूर्ण
खनिजों को अध्ययन
की दृष्टिकोण से
तीन वर्गेाे-घात्विक, अधात्विक
एवं उर्जा खनिज
संसाधन ंमें विभक्त
किया गया है।छत्तीसगढ
़प्रदेश में धात्विक
खनिज के अन्तर्गत
लौह समूह के खनिज
में लौह खनिज पर
आधरित 58 उद्योग जिनमें
30643 ़47 लाॅख रूपए
का पूंजी निवेश
कर 149881 व्यक्ति
आश्रित है।केवल
भिलाई इस्पात संयंत्र
में 2300 करोड़
रूपए निवेश किया
गया है इस पर आश्रित
सहायक उद्योग की
संख्या 33 है जिनमें
भिलाई में 22 कारखानें
5कारखानें
रायपुर, 3कारखानें दुर्ग
एवं 3कारखानें
राजनांदगांव में
स्थापित है। धात्विक
खनिज संसाधन का
सर्वाधिक उपयोग
मध्यवर्ती क्षेत्र
में हुआ है।
राष्ट्र के
बाॅक्साइड उत्पादन
का 3 ़90 प्रतिशत
भण्डार प्रदेश
में उपलब्ध है।केंद्र
सरकार के सार्वजनिक
उपक्रम के अन्तर्गत
1975 में भारत
एल्यूमीनियम कम्पनी
लि ़ जिला कोरबा
में स्थापित किया
गया है। अधात्विक
खनिज संसाधन के
आधार पर छत्तीसगढ़
के मैदानी क्षेत्र
का विकास सर्वाधिक
हुआ है प्र्रदेश
के बृहद सीमेण्ट
उद्योग का स्थानीयकरण
मैदानी क्षेत्र
में हुआ है जिसमें
221378 ़14 लाॅख रूपए
निवेश कर 9518 व्यक्तियांें
केा रोजगार प्राप्त
हुआ है। उर्जा
खनिज संसाधन की
दृष्टिकोण से राज्य
संपन्न है। यहाॅ
उर्जा खनिज कोयला
के उपलब्ध भण्डार
के आधार पर कोरबा
एवं बिलासपुर ताप
विद्युत संयत्र
की स्थापना की
गई है। कोरबा के
विकास में उर्जा
खनिज का महत्वपूर्ण
स्थान है।
प्रादेशिक
एवं आर्थिक विकास
स्तर की गणना हेतु
आठ चरों को सम्मिलित
किया गया है,जो क्षेत्र
के आर्थिक विकास
के सूचक है।इन
सूचको का स्कोर
निकाला गया तथा
समस्त सूचक को
सम्मिलित कर समन्वित
स्कोर के आधर पर
समन्वित क्षेत्रीय
विकास स्तर ज्ञात
किया गया है। समन्वित
विकास स्तर का
क्षेत्रीय प्रतिरूप
जिलेवार -1 ़24 से $11 ़11 तक विस्तृत
है।अतः इस आधार
पर प्रदेश को पाॅच
वर्गो ं -अत्यधिक
विकास($5 ़0 से अधिक)इसके
अन्तर्गत रायपुर,दुर्गएवं
कोरबा जिला है,अधिक विकास($2 ़0 से 5 ़0) इसमें
बिलासपुर जिला
सम्मिलित है,मध्यम
विकास (े -00से$2 ़5)इस वर्ग के
अन्तर्गत जांजगीर
जिला सम्मिलित
है,न्यून
विकास (-2 ़5 से00़0 )इस वर्ग के
अन्तर्गत महासमुंद
,राजनांदगांव, रायगढ़, सरगुजा
एवं कोरिया जिला
है,तथा
अंतिम वर्ग अति
न्यून विकास(-2 ़5 से कम)इस
वर्ग में धमतरी, कवर्धा
,बस्तर,कांकेर
एवं दंतेवाड़ा जिला
है (मानचित्र क्रमांक1)।
उपरोक्त अध्ययन
से स्पष्ट है कि
प्रदेश का सर्वाधिक
विकसित मध्यवर्ती
क्षेत्र पूर्णतः
मैदानी क्षेत्र
है जबकि दक्षिण
और उत्तर पहाड़ी
क्षेत्र न्यून
विकसित है लेकिन
वहाॅ विकास की
संभावनाए प्रदेश
के आर्थिक विषमता
को ज्ञात करने
के लिए आठ चरों
के आधार पर जिला
स्तर पर आंकड़ो
की व्याख्या की
गई है।चरो के आठ
बाइ आठ के सहसंबंध
मैट्रिक्स के आधार
पर कारक विश्लेषण
विधि का प्रयोग
किया गया है। सहसंबंध
मैट्रिक्स के आईगन
मूल्य 3 ़888,2 ़122,1 ़038,0 ़5036,0 ़3773,0 ़4690,0 ़0191 एवं 0 ़0054 है। यदि तीसरी
आइ्रगन मूल्य को
लगभग एकत्व मानने
पर केवल दो आइगन
मूल्य ऐसे है जो
एकत्व से बड़े है।
विेकास के दो तत्व
जो एक साथ कुल 75 प्रतिशत
उपक्रम बनाते है
और लाभदायक परिणाम
देते है जो निम्न
है-
1 प्रथम प्रमुख
कारक प्रथम प्रमुख
कारक का योाग 3 ़888 प्रसरण
के मुल्य को प्रदर्शित
करता (तालिका क्रं-1) है।यह
विभिन्न आठ चरो
(खानो की संख्या,उद्योग, पूंजी
निवेश,रोजगार उर्जा
खपत एवं सड़को की
लम्बाई )के प्रभाव
से विकसित हुआ
है। इन चरों का
संयोजन औद्यौगिक
विकास की उच्चता
को स्थापित करता
है अतः इसे औद्यौगिक
विकास का सूचकांक
कहा जाता है।ऋणात्मक
क्षेत्रीय भरित
समंक उच्च स्तर
के औद्यौगीकरण
को इंगित करतें
है,धनात्मक
क्षेत्रीय भारित
सूचकांक के औद्यौगिकरण
के स्तर को कम करते
है।इन्हें तीन
वर्गो में विभक्त
किया गया है -जिसमें
प्रथम क्षेत्रीय
भारित सूचकांक
समंक(-1 से कम) ऋणात्मक
उच्च स्तर के औद्यौगिक
विकास को दर्शाता
है जिसके अन्तर्गत
रायपुर,दुर्ग एवं
बिलासपुर जिलें
आतें है।इनका विकास
खनिज राजस्व ,खानो की
संख्या,उद्योग की
विकास जिसके अन्तर्गत
महासमुंद, राजनांदगांव, कोरबा,जांजगीर
एवं रायगड़ जिले
आते है,तथा निम्न
विकसित क्षेत्र
($1 से
कम) निम्न स्तर
के विकास के सूचक
है जिनके अन्तर्गत
धमतरी, कवर्धा, बस्तर, दंतेवाड़ा
,कांकेर
,जशपुर
,सरगुजा
एवं कोरिया जिलें
आतें है जहाॅ विकास
की अत्यधिक संभावनाएं
(मानचित्र क्रं
़2) है।
2 द्वितीय प्रमुख
कारक इस कारक का
आइगन मूल्य 2.1220 है
जो 26 ़52 प्रतिशत प्रसरण
को प्रदर्शित करता
है। द्वितीय प्रमुख
कारक के अन्तर्गत
मुख्य चर उत्पादन, सड़को की
लम्बाई, ,एवं्र खनिज
राजस्व है जिनका
संयोजन सेवा क्षेत्र
के सूचकांक को
इंगित करता (मानचित्र
क्रं ़3) है।इसे तीन
वर्गो में विभक्त
किया गया है-प्रथम
निम्न सेवा (़0 70से अधिक)
जिसके अन्तर्गत
रायपुर, कोरबा, दंतेवाड़ा सरगुजा
एव्र कोरिया जिलें
है,मध्यम
सेवा क्षेत्र(0 ़70 से -0़ ़70) के अन्तर्गत
दुर्ग,बस्तर एवं
रायगढ़ जिले आतें
है तथा उच्च सेवा
क्षेत्र (- 0 ़70 से कम) के
अन्तर्गत धमतरी, महासमुंद, कवर्धा,राजनांदगांव,कांकेर
,बिलासपुर,जांजगीर
एवं जशपुर जिलें
आते है।
परोक्त अध्ययन
से प्राप्त निष्कर्ष
के अनुसार जिन
जिलो में खनिज
संसाधनकी प्रचुरता
है वह क्षेत्र
आर्थिक दृष्टि
से निर्धन है।
अतः इन क्षेत्रो
के संसाधन का वास्तविक
उपयोग कर क्षेत्र
का विकास किया
जा सकता है।
समस्या एवं
सुझाव -
1 भौगोलिक
कारण: भौगोलिक
दृष्टिकोण से प्रदेश
के उच्चावच, जलवायु
मृृदा,एवं
भू-गर्भिक संरचना
में विविधता हैं।मध्यवर्ती
विकसित क्षेत्र
मैदानी क्षेत्र
है जबकि उत्तर
एवं दक्षिण पहाड़ी
पठारी क्षेत्र
है जहाॅ विकास
कम हुआ है।
2 खनिज संसाधन
की उपलब्धता: प्रदेश
खनिज संसाधन की
दृष्टिकोण में
संपन्न है, परंतु खनिजों
का अनुकूलतम उपयोग
नही हो रहा है।
आवश्यक्ता है कि
खनिज संसाधनों
का दोहन स्थानीय
हो जिससे क्षेत्रीय
विकास संभव है।
3 हमारी
खनिज नीति के क्लिष्ट
मापदण्ड एवं शर्तो
के कारण खनिज विदोहन
संबंधि अनुमति
प्राप्त करना आसान
नही है। अतः आवश्यक्ता
है कि हमारी खनिज
नीति में नियम
एवं प्रक्रिया
को सरल, त्वरित, निर्णयो में
पारदर्शी बनाये
रखने एवं स्थानीय
व विदेशी पूंजी
निवेश को आकर्षित
करने हेतु व्यवसायिक
वातावरण तैयार
करना जिससे खनिजों
के विदोहन के साथ
क्षेत्रीय विकास
संभव है।
4 प्रदेश
में जल जमीन एवं
विद्युत की कमी
नही है जबकि अन्य
राज्य में यह एक
समस्या है।मुम्बई
में संयंत्र के
लिए वासी एवं सिलवासा
में जमीन जबकि
दिल्ली वालो को
नोएडा में भी जमीन
नही मिल रही है
। इसके लिए आवश्यक
है कि हमारी शासकीय
नीति में परिवर्तन
हो, करो
में छूट, ऋण सुविधा,औपचारिक्ता
को सरल बनाना,उद्योग
के निर्माण की
प्रक्रिया को सरल
करना आदि जिससे
निम्न विकसित क्षेत्रो
का भी विकास हो
सके।
5 पूंजी
निवेश में वृध्दि
की जाए।
6 खनिजों
पर आधारित उद्योगो
को प्रोत्साहन
दी जाए।
7 खनिजो
का उत्खनन एवं
उपयोग अनुकूलतम
हो।60 प्रतिशत
लोहांस वाले खनिजों
के उत्खनन के साथ
40 प्रतिशत
खनिजों का भी उपयोग
होना चाहिए।
8 आधरभूत
संरचना को मजबूत
करना होगा।
9 लघु औद्यौगिक
इकाइयो को प्रोत्साहन
देना।
10 खनिजों
का स्थानीय उपयोग
होना चाहिए।
निष्कर्षः
भौगोलिक ,आर्थिक
और सामाजिक विषमता
के साथ प्रदेश
विश्व खनिज मानचित्र
में एक विशिष्ठ
स्थान है। यहाॅ
25 प्रकार
से अधिक खनिज पाये
जातें है लेकिन
11 प्रकार
के खनिजों का उत्पादन
होता है। आर्थिक
दृष्टिकोण से संपन्न
क्षेत्र खनिज संसाधन
की दृष्टिकोण से
विपन्न है लेकिन
खनिज संसाधन की
दृष्टिकोण से संपन्न
क्षेत्र आर्थिक
दृष्टिकोण से विपन्न
है। अतः आवश्यक्ता
है स्थानीय संसाधन
का क्षेत्रीय उपयोग
करने के साथ आधरभूत
संरचना का विकास
करें और खनिज आधरित
आर्थिक विकास की
क्षेत्रीय विषमता
को कम कर सकें जिससे
क्षेत्र का समन्वित
विकास सके।
संदर्भ:
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तत्व ,उत्तर भारत
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पत्रिका, अंक 32जून -दिसंबर
पृष्ठ 79-89
4.
सिंह, रामानंद(1986): बाराबाकी
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जिलों में
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तुलनात्मक
अध्ययन, उत्तर
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पत्रिका अंक32 जून-
दिसंबर
पृृष्ठ127-132
5.
मिश्र
की
कृष्णकुमार
एवं रमेश
चंद्र नामदेव
(1997) औद्यौगिक
विकास एवं
नियोजन
उरइ्र्र
तहसील(उप्र) का
एक प्रतीक
अध्ययऩ
भू-विज्ञान, अंक 12 भाग 1एवं 2जनवरी-जुलाई
पृष्ठ37-48
6.
संचालनालय भैमिकी एवं खनिकर्म रायपुर (2003): छत्तीसगढ़
खनिज
सांख्यिकीय
Received on 12.02.2014
Modified on 25.02.2014
Accepted on 03.03.2014
© A&V Publication
all right reserved
Research J. Humanities
and Social Sciences. 5(1): January-March, 2014, 1-4